देशभर में ईपीएस-95 (EPS-95) पेंशनरों के दिल में एक ही सवाल है —
“क्या हमें हमारी वैध बढ़ी हुई पेंशन कभी मिलेगी?”
2014 से पहले सेवानिवृत्त हुए लाखों बुजुर्ग कर्मचारी, जिन्होंने अपने जीवन की सबसे उपयोगी उम्र देश को दी, आज आर्थिक असमानता, स्वास्थ्य संकट और सामाजिक उपेक्षा के बीच जूझ रहे हैं।
उनकी पेंशन आज भी ₹1000-₹2000 प्रति माह जैसी बेहद मामूली राशि तक सीमित है। क्या यह सम्मानजनक जीवन के लायक है?
बार-बार लटकता सवाल, हर ओर से चुप्पी
- सरकार: “विचाराधीन है…”
- श्रम मंत्रालय: “CBT बैठक में चर्चा करेंगे…”
- संसद: “बिल आएगा, समय आने पर…”
- EPFO: “कोर्ट केस पेंडिंग है…”
- जनप्रतिनिधि: “अभी कुछ नहीं कह सकते…”
हर बार आश्वासन, हर बार इंतज़ार। पर न्याय अभी भी कोसों दूर है।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश और सरकारी चुप्पी
सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि उच्च पेंशन का विकल्प मिलना चाहिए, और योग्य पेंशनधारकों को इसका लाभ मिलना चाहिए।
पर सवाल यह है —
क्या EPFO और सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करना चाहती भी है या नहीं?
CBT की हर अगली बैठक में सिर्फ चर्चा होती है, निर्णय नहीं। क्यों?
एक असहाय बुजुर्ग की हकीकत
देश में हजारों EPS-95 पेंशनर ऐसे हैं जो:
- महंगाई की मार से परेशान हैं,
- नियमित दवाइयों का खर्च नहीं उठा पा रहे,
- बीमारियों से जूझ रहे हैं,
- और इंसाफ की उम्मीद में दम तोड़ रहे हैं।
यह सिर्फ आंकड़े नहीं, ये भारत माता के वे सपूत हैं जिन्होंने रेलवे, डाक विभाग, सार्वजनिक उपक्रमों और हजारों सरकारी संस्थानों को अपने खून-पसीने से खड़ा किया।
उम्मीद या आखिरी सांस?
कहते हैं “उम्मीद पर दुनिया कायम है”, पर जब हर दरवाजा बंद हो, तो क्या बुजुर्ग EPS पेंशनरों के पास मौन पीड़ा के सिवा कुछ बचता है?
आज इस वर्ग के लोग धीरे-धीरे दुनिया से विदा ले रहे हैं — बिना न्याय पाए, बिना गरिमा के, और बिना सरकारी सहारा के।
एक सवाल, सरकार से
अगर सांसदों, विधायकों और मंत्रियों की पेंशन और भत्ते हर साल बढ़ सकते हैं,
तो क्या देश के रिटायर्ड कर्मचारियों की पेंशन का फैसला लेना इतना मुश्किल है?
क्या इन बुजुर्गों की आर्थिक सुरक्षा कोई प्राथमिकता नहीं?
निष्कर्ष: राजनीति नहीं, इंसाफ चाहिए
EPS-95 पेंशनर्स की लड़ाई कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक सामाजिक और नैतिक सवाल है।
- यह सवाल है इंसानियत का
- यह सवाल है संवेदनशीलता का
- यह सवाल है उस व्यवस्था का, जिसे इन बुजुर्गों ने खड़ा किया है
हम सरकार से अपील करते हैं —
बुजुर्ग पेंशनरों की व्यथा को समझें, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का सम्मान करें, और शीघ्र निर्णय लेकर इन्हें उनका वास्तविक हक दिलाएं।
आपकी आवाज़ बनिए
अगर आप भी EPS-95 पेंशनर्स के साथ खड़े हैं तो—
- इस लेख को साझा कीजिए,
- अपनी लोकसभा सीट के सांसद से सवाल पूछिए,
- और सरकार तक यह संदेश पहुंचाइए कि
“अब और इंतजार नहीं, इंसाफ चाहिए — अभी और यहीं।

माझं नाव एन. डी. यादव आहे. मला लेखन क्षेत्रात ६ वर्षांचा अनुभव आहे. माझ्या लेखन प्रवासात मी सरकारी धोरणे, कर्मचारी व निवृत्तीवेतनधारकांचे हक्क, पेन्शन योजना तसेच जनकल्याणकारी योजना याबाबतची माहिती तुम्हांपर्यंत सोप्या आणि स्पष्ट भाषेत पोहोचवण्याचे कार्य केले आहे.
माझ्या लेखांचा उद्देश लोकांना अचूक, योग्य आणि विश्वासार्ह माहिती उपलब्ध करून देणे हा आहे. मी नेहमी प्रयत्न करतो की माझ्या लेखनातील भाषा साधी-सोप्या स्वरूपाची असावी, माहिती उपयोगी असावी आणि वाचकांना कोणत्याही विषयाचे आकलन करण्यात अडचण येऊ नये.
