भारत में तेजी से बढ़ रही बुजुर्ग आबादी, दो-तिहाई वरिष्ठ नागरिक पेंशन से बाहर; रिपोर्ट ने जताई चिंता

भारत में बुजुर्गों की संख्या लगातार बढ़ रही है और आने वाले वर्षों में यह बदलाव देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की संख्या बढ़ने के साथ सबसे बड़ा सवाल यह है कि रिटायरमेंट के बाद उनके पास नियमित आय का कितना मजबूत साधन होगा।

हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट में देश की मौजूदा पेंशन व्यवस्था को लेकर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब दो-तिहाई बुजुर्ग किसी सामाजिक, अनिवार्य या स्वैच्छिक पेंशन योजना के दायरे में नहीं हैं। इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिकों के पास बुढ़ापे में नियमित आय की पर्याप्त सुरक्षा नहीं है।

यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की बुजुर्ग आबादी आने वाले दशकों में काफी तेजी से बढ़ने वाली है।

2050 तक कितनी बढ़ जाएगी बुजुर्ग आबादी?

रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2022 में देश में 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की संख्या करीब 15.3 करोड़ थी। उस समय कुल आबादी में बुजुर्गों की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत थी।

2025 में यह संख्या बढ़कर करीब 15.8 करोड़ हो गई और कुल आबादी में बुजुर्गों की हिस्सेदारी लगभग 11 प्रतिशत पहुंच गई।

आने वाले वर्षों के अनुमान और भी महत्वपूर्ण हैं। 2035 तक 60 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी करीब 20.7 करोड़ हो सकती है। 2045 में यह संख्या 26.5 से 29 करोड़ के बीच पहुंचने का अनुमान है। वहीं 2050 तक देश में बुजुर्गों की संख्या करीब 34.6 से 34.7 करोड़ हो सकती है। उस समय कुल आबादी में उनकी हिस्सेदारी लगभग 20 से 21 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है।

यानी आने वाले समय में भारत की आबादी में हर पांच में से लगभग एक व्यक्ति 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र का हो सकता है।

सबसे बड़ी चिंता नियमित आय की

बढ़ती उम्र के साथ रोजगार के अवसर कम हो जाते हैं। ऐसे में पेंशन और दूसरी सामाजिक सुरक्षा योजनाएं बुजुर्गों के लिए नियमित आय का महत्वपूर्ण जरिया बन जाती हैं।

लेकिन मौजूदा व्यवस्था की एक बड़ी समस्या यह है कि इसका लाभ देश के सभी बुजुर्गों तक नहीं पहुंच रहा है। रिपोर्ट के अनुसार करीब दो-तिहाई बुजुर्ग किसी पेंशन योजना से जुड़े हुए नहीं हैं।

पेंशन का लाभ पाने वालों में बड़ी संख्या पूर्व सरकारी कर्मचारियों और उनके जीवित परिजनों की है। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे लाभार्थियों की संख्या कुल बुजुर्ग आबादी के 7 प्रतिशत से भी कम है।

इससे यह सवाल उठता है कि असंगठित क्षेत्र और कम आय वाले परिवारों से आने वाले वरिष्ठ नागरिकों के लिए बुढ़ापे में आर्थिक सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए।

87.5 प्रतिशत कामगार पेंशन से बाहर

समस्या सिर्फ मौजूदा बुजुर्गों तक सीमित नहीं है। आज काम कर रही आबादी का एक बड़ा हिस्सा भी भविष्य में पेंशन सुरक्षा से बाहर रह सकता है।

रिपोर्ट के अनुसार करीब 87.5 प्रतिशत कामगार किसी सार्वजनिक या निजी पेंशन योजना में शामिल नहीं हैं। सरकार ने अटल पेंशन योजना और प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन जैसी योजनाओं के माध्यम से लोगों को पेंशन के दायरे में लाने की कोशिश की है, लेकिन अभी भी बड़ी संख्या में कामगार इस सुरक्षा से बाहर हैं।

अगर वर्तमान स्थिति में बड़ा बदलाव नहीं होता है, तो आने वाले दशकों में बुजुर्गों की बढ़ती संख्या के साथ आर्थिक सुरक्षा की चुनौती भी बढ़ सकती है।

सरकार का पेंशन खर्च भी बढ़ रहा है

एक तरफ बड़ी संख्या में बुजुर्ग पेंशन से बाहर हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार के पेंशन खर्च में लगातार वृद्धि हुई है।

रिपोर्ट के मुताबिक सामान्य सरकार के राजस्व खर्च में पेंशन और दूसरे रिटायरमेंट लाभों की हिस्सेदारी 1987-88 में 3.6 प्रतिशत थी। यह 2003-04 में बढ़कर 6.2 प्रतिशत और 2020-21 में 10.2 प्रतिशत हो गई।

इस तरह करीब तीन दशकों में सरकारी राजस्व खर्च में पेंशन की हिस्सेदारी लगभग तीन गुना हो गई।

इस बढ़ते खर्च के साथ सरकार के सामने दोहरी चुनौती है—एक तरफ मौजूदा पेंशन दायित्वों को पूरा करना और दूसरी तरफ उन करोड़ों लोगों को सामाजिक सुरक्षा देना जो अभी पेंशन व्यवस्था से बाहर हैं।

पेंशन व्यवस्था को दो हिस्सों में बांटने का सुझाव

रिपोर्ट में पेंशन व्यवस्था को दो प्रमुख हिस्सों में विकसित करने का सुझाव दिया गया है।

पहला हिस्सा जरूरतमंद बुजुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा आधारित पेंशन का हो सकता है। इसका खर्च सरकार द्वारा उठाया जाए, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर वरिष्ठ नागरिकों को कम से कम एक निश्चित आय मिल सके।

दूसरा हिस्सा रोजगार आधारित पेंशन का हो, जिसमें कर्मचारी और नियोक्ता दोनों योगदान करें। इससे भविष्य में कामगारों को रिटायरमेंट के बाद नियमित आय मिल सकती है और पूरी व्यवस्था का बोझ केवल सरकारी खजाने पर नहीं पड़ेगा।

पेंशन नियमों की समीक्षा की जरूरत

रिपोर्ट में मौजूदा पेंशन व्यवस्था के कुछ प्रावधानों की समीक्षा करने की भी बात कही गई है। इसमें पेंशन के लिए जरूरी सेवा अवधि और पेंशन की गणना जैसे नियमों पर दोबारा विचार करने का सुझाव शामिल है।

इसके अलावा पेंशन की गणना केवल अंतिम या सबसे अधिक वेतन के आधार पर करने के बजाय लंबे समय के औसत वेतन को ध्यान में रखने की संभावना पर भी विचार करने की बात कही गई है।

रिटायरमेंट पर मिलने वाले कुछ एकमुश्त लाभों और अर्जित अवकाश के नकदीकरण जैसे प्रावधानों की भी समीक्षा का सुझाव दिया गया है। रिपोर्ट का तर्क है कि इससे बचने वाले संसाधनों का इस्तेमाल स्वास्थ्य, शिक्षा और व्यापक सामाजिक पेंशन व्यवस्था को मजबूत करने में किया जा सकता है।

असंगठित क्षेत्र के कामगारों पर विशेष ध्यान

भारत में बड़ी संख्या में लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। इनमें घरेलू कामगार, छोटे दुकानदार, दिहाड़ी मजदूर और दूसरे स्वरोजगार से जुड़े लोग शामिल हैं।

इनमें से कई लोगों के पास सरकारी नौकरी जैसी नियमित पेंशन व्यवस्था नहीं होती। इसलिए रिटायरमेंट के बाद उनकी आर्थिक स्थिति काफी हद तक परिवार और व्यक्तिगत बचत पर निर्भर हो जाती है।

रिपोर्ट में 40 वर्ष से कम उम्र के असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए अनिवार्य, सार्वजनिक और वित्त पोषित पेंशन व्यवस्था तैयार करने जैसे सुझाव पर भी जोर दिया गया है।

बुजुर्गों की बढ़ती संख्या के साथ बढ़ेगी चुनौती

भारत में बुजुर्ग आबादी का बढ़ना केवल पेंशन का मुद्दा नहीं है। इसके साथ स्वास्थ्य सेवाओं, दवाइयों, देखभाल, आवास और सामाजिक सुरक्षा की जरूरत भी बढ़ेगी।

आज जो युवा और मध्यम आयु वर्ग के लोग काम कर रहे हैं, उनके लिए भी रिटायरमेंट प्लानिंग महत्वपूर्ण होती जा रही है। केवल सरकारी पेंशन पर निर्भर रहने के बजाय बचत, निवेश और उपलब्ध सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की जानकारी रखना भविष्य के लिए उपयोगी हो सकता है।

निष्कर्ष

भारत तेजी से बदलती जनसांख्यिकी के दौर से गुजर रहा है। बुजुर्गों की संख्या आने वाले वर्षों में करोड़ों में बढ़ने वाली है, लेकिन वर्तमान में बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिक पेंशन सुरक्षा से बाहर हैं। दूसरी ओर सरकार का पेंशन खर्च भी लगातार बढ़ रहा है।

ऐसे में भविष्य की पेंशन व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जो बुजुर्गों को सम्मानजनक और नियमित आय दे, ज्यादा से ज्यादा कामगारों को पेंशन के दायरे में लाए और सरकारी वित्त पर अनावश्यक दबाव भी न बढ़ाए।

फिलहाल सामने आई रिपोर्ट ने इस मुद्दे पर एक महत्वपूर्ण बहस को जन्म दिया है। आने वाले वर्षों में भारत के लिए सिर्फ पेंशन की राशि बढ़ाना ही नहीं, बल्कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाना भी उतना ही जरूरी होगा।

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