फिटमेंट फैक्टर 2.57 कैसे तय हुआ? असली बढ़ोतरी कितनी थी और 157% का दावा क्यों गलत है

सातवें वेतन आयोग की चर्चा होते ही सबसे ज्यादा जिस आंकड़े का जिक्र किया जाता है, वह है 2.57 का फिटमेंट फैक्टर। कई बार कर्मचारियों और पेंशनर्स के बीच यह सवाल भी उठता है कि अगर पुरानी बेसिक सैलरी को 2.57 से गुणा किया गया था, तो क्या वास्तव में वेतन में 157 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी?

इस सवाल का जवाब समझने के लिए फिटमेंट फैक्टर के पीछे का पूरा गणित समझना जरूरी है। दरअसल 2.57 को सीधे 157 प्रतिशत की वास्तविक वेतन वृद्धि मानना सही नहीं है। इस आंकड़े में पहले से मिल रहा महंगाई भत्ता यानी DA भी शामिल था।

2.57 का फिटमेंट फैक्टर कैसे निकला?

सातवें वेतन आयोग में न्यूनतम वेतन को 6वें वेतन आयोग के ₹7,000 से बढ़ाकर ₹18,000 प्रतिमाह किया गया था।

यही वह आधार है, जिससे 2.57 का आंकड़ा सामने आया।

इसका सीधा गणित है:

₹18,000 ÷ ₹7,000 = 2.5714

इसे राउंड करने पर फिटमेंट फैक्टर 2.57 बनता है।

इसका मतलब यह नहीं है कि किसी कर्मचारी की जेब में पहले मिलने वाली रकम से सीधे 157 प्रतिशत अतिरिक्त पैसा आ गया। 2.57 में पुरानी सैलरी के साथ उस समय तक मिल रहा DA भी शामिल था।

₹7,000 की पुरानी सैलरी में क्या शामिल था?

6वें वेतन आयोग के समय न्यूनतम वेतन के लिए पे बैंड में ₹5,200 और ग्रेड पे ₹1,800 को जोड़कर ₹7,000 का आंकड़ा बनता था।

लेकिन कर्मचारी को केवल ₹7,000 ही नहीं मिल रहे थे। जनवरी 2016 में केंद्रीय कर्मचारियों के लिए DA 125 प्रतिशत था।

इसलिए ₹7,000 के बेसिक पर 125 प्रतिशत DA जोड़ने पर गणना इस प्रकार बनती है:

₹7,000 बेसिक

  • ₹8,750 DA
    = ₹15,750

यानी सातवें वेतन आयोग लागू होने से पहले न्यूनतम बेसिक वाले कर्मचारी को बेसिक और DA मिलाकर ₹15,750 मिल रहे थे।

फिर ₹18,000 की नई बेसिक सैलरी कैसे बनी?

सातवें वेतन आयोग ने न्यूनतम वेतन ₹18,000 तय किया। इसका मतलब यह हुआ कि पहले से मिल रहे ₹15,750 की तुलना नई बेसिक ₹18,000 से करनी चाहिए।

गणना:

₹18,000 − ₹15,750 = ₹2,250

अब ₹2,250 की बढ़ोतरी को ₹15,750 से तुलना करने पर लगभग 14.29 प्रतिशत का अंतर निकलता है।

यही वजह है कि 2.57 को 157 प्रतिशत की वास्तविक वेतन वृद्धि मानना सही नहीं है।

2.57 में 2.25 का क्या महत्व है?

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात DA के समायोजन की है।

जनवरी 2016 में DA 125 प्रतिशत था। इसे बेसिक में समायोजित करने के लिए:

100 प्रतिशत बेसिक + 125 प्रतिशत DA = 225 प्रतिशत

यानी यह हिस्सा 2.25 के बराबर बैठता है।

सरल भाषा में समझें तो 2.25 का बड़ा हिस्सा पहले से मिल रहे DA को नई बेसिक सैलरी में शामिल करने से संबंधित था। इसके बाद जो वास्तविक अतिरिक्त हिस्सा आया, वह लगभग 1.1429 यानी 14.29 प्रतिशत के बराबर था।

दोनों को मिलाकर:

2.25 × 1.1429 ≈ 2.57

इससे समझ आता है कि 2.57 का पूरा हिस्सा नई कमाई नहीं था।

157 प्रतिशत बढ़ोतरी कहना क्यों गलत है?

अगर कोई व्यक्ति केवल इतना देखे कि पुरानी बेसिक ₹7,000 थी और नई बेसिक ₹18,000 हो गई, तो उसे लगभग 157 प्रतिशत की छलांग दिखाई दे सकती है।

लेकिन पुरानी व्यवस्था में ₹7,000 के ऊपर 125 प्रतिशत DA पहले से मिल रहा था।

इसलिए सही तुलना ₹7,000 और ₹18,000 के बीच नहीं, बल्कि उस समय मिल रहे बेसिक और DA को मिलाकर बनी रकम तथा नई बेसिक के बीच करनी होगी।

यानी:

पुरानी बेसिक और DA = ₹15,750

नई बेसिक = ₹18,000

इस आधार पर वास्तविक अंतर लगभग 14.29 प्रतिशत बैठता है।

इसीलिए फिटमेंट फैक्टर को सीधे वेतन वृद्धि का प्रतिशत समझना सही तरीका नहीं है।

6वें वेतन आयोग के 1.86 से 2.57 की तुलना क्यों सावधानी से करनी चाहिए?

कई जगह 6वें वेतन आयोग के 1.86 और सातवें वेतन आयोग के 2.57 की सीधी तुलना की जाती है।

लेकिन दोनों की संरचना एक जैसी नहीं थी।

6वें वेतन आयोग में 1.86 के साथ ग्रेड पे की व्यवस्था अलग थी। वहीं सातवें वेतन आयोग में बेसिक पे और ग्रेड पे को मिलाकर नई पे मैट्रिक्स में फिटमेंट किया गया।

सातवें वेतन आयोग में 2.57 का इस्तेमाल मौजूदा वेतन को नई पे मैट्रिक्स में फिट करने के लिए किया गया। इसलिए केवल 1.86 बनाम 2.57 देखकर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है कि सातवें वेतन आयोग में वास्तविक बढ़ोतरी 6वें वेतन आयोग से उतनी ही ज्यादा थी।

2.62, 2.67 और 2.72 क्या अलग-अलग फिटमेंट फैक्टर थे?

यह भी कर्मचारियों के बीच एक आम भ्रम है।

सातवें वेतन आयोग की पे मैट्रिक्स में अलग-अलग लेवल के लिए अलग शुरुआती वेतन निर्धारित किए गए थे। इन्हें देखकर कई बार 2.62, 2.67 या 2.72 जैसे आंकड़ों को भी फिटमेंट फैक्टर समझ लिया जाता है।

लेकिन कर्मचारी की मौजूदा बेसिक सैलरी पर अलग-अलग इन आंकड़ों को लगाकर वेतन तय नहीं किया गया था।

वेतन निर्धारण में 2.57 का फिटमेंट फैक्टर इस्तेमाल किया गया और इसके बाद कर्मचारी को संबंधित पे लेवल की पे मैट्रिक्स में उचित सेल पर रखा गया।

इसलिए अपनी सैलरी का हिसाब लगाते समय 2.62 या 2.72 को अलग से गुणा करना सही तरीका नहीं है।

8वें वेतन आयोग के लिए क्या सीख मिलती है?

अब सबसे बड़ा सवाल 8वें वेतन आयोग के फिटमेंट फैक्टर को लेकर है।

फिलहाल 8वें वेतन आयोग के लिए कोई अंतिम फिटमेंट फैक्टर तय नहीं हुआ है। अलग-अलग कर्मचारी संगठन और विशेषज्ञ अलग-अलग आंकड़े बताते रहे हैं, लेकिन किसी मांग या अनुमान को अंतिम सरकारी फैसला नहीं माना जा सकता।

8वें वेतन आयोग में जब भी अंतिम फिटमेंट फैक्टर तय होगा, तब केवल उसके बड़े आंकड़े को देखकर वास्तविक वेतन वृद्धि का अंदाजा लगाना सही नहीं होगा।

उदाहरण के लिए यदि भविष्य में कोई बड़ा फिटमेंट फैक्टर सामने आता है, तो यह देखना जरूरी होगा कि उसमें उस समय का DA कितना शामिल है और वास्तविक अतिरिक्त बढ़ोतरी कितनी है।

यही तरीका कर्मचारियों और पेंशनर्स को किसी भी फिटमेंट फैक्टर की वास्तविक तस्वीर समझने में मदद करेगा।

निष्कर्ष

सातवें वेतन आयोग का 2.57 फिटमेंट फैक्टर 157 प्रतिशत की वास्तविक वेतन वृद्धि नहीं था। यह पुराने और नए वेतन ढांचे के बीच वेतन निर्धारण का एक गुणक था, जिसमें उस समय तक मिल रहा 125 प्रतिशत DA भी शामिल था।

₹7,000 की पुरानी न्यूनतम सैलरी और 125 प्रतिशत DA को मिलाकर ₹15,750 की राशि बनती थी। इसके मुकाबले ₹18,000 की नई न्यूनतम बेसिक सैलरी लगभग 14.29 प्रतिशत अतिरिक्त राशि को दर्शाती है।

इसलिए जब भी 8वें वेतन आयोग के फिटमेंट फैक्टर को लेकर कोई आंकड़ा सामने आए, केवल 2.XX या 3.XX देखकर उसे वेतन वृद्धि का प्रतिशत नहीं समझना चाहिए। सबसे पहले यह देखना जरूरी होगा कि उस आंकड़े में DA का समायोजन कितना है और वास्तविक अतिरिक्त वृद्धि कितनी है।

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